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एक आदमी चला इतना चला,

एक आदमी चला
इतना चला,
दुनिया से आगे
निकल गया ,
पर घर नहीं
पहुंचा
एक आदमी चला
राजा था, मंत्री थे
संत्री थे,
सेनानायक था,
सेना थी,
जननायक थे,
जनसेवक थे,
समाज सेवक थे,
कर्तव्यनिष्ट थे,
कर्तव्यपरायण थे,
सब साथ चले
पर बराबर नहीं चल सके,
आदमी अकेला ही था
एक आदमी चला
इतना चला
दुनिया से आगे
निकल गया
एक आदमी चला
सड़के थी, गाड़ी थी,
ड्राइवर था,
देश था, राज्य था,
जिले थे, शहर था,
गांव था, घर था
अपने थे, पड़ोसी थे
सब साथ चले
पर बराबर नहीं चल सके,
आदमी अकेला ही था
एक आदमी चला
इतना चला
दुनिया से आगे
निकल गया
एक आदमी चला
वह पहुंच गया
सृष्टि के उस पार
जीवन भर साथ चलने वाले
लोगों को देखने
देखने कि कब तक
साथ चले

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मैं  चमकते  दीप की बाती बनूँ तो फिर तुम्हारे प्यार की पाती बनूँ तो तुम  जरा  नजरें उठा कर देखो ना स्वर सजाए  प्यार  के गाती  बनूँ तो मुख से अपने फिर हटाओ हाथो को चेहरा तुम्हारा देखकर जाती बनूँ तो दिल से मेरे नाम अपना ना मिटाओ भूलकर फिर  प्रीत  दुहराती बनूँ तो मैं  चमकते  दीप की बाती बनूँ तो फिर तुम्हारे प्यार की पाती बनूँ तो भरत राज़
हर   एक   जवां   सिकंदर  सोता जा रहा हैं आँख के आगे इंगित मंजर खोता जा रहा हैं मिल्खियत  के  वास्ते काटे  थे अपनों के गले आज वो छोटा सा टुकड़ा बंजर होता जा रहा हैं खूबसूरत सा हैं , आईना दाग चेहरे के दिखता हाथ  से  जो गिर गया , खंजर होता जा रहा हैं राज़  तूने  कोरे कागज,  कर  दिए हैं चार काले चार आखर आज तेरा मुक्क़दर होता जा रहा हैं यार तेरे कुछ मतले  रखना यूँ संभाल  कर फेसबुकिया हर प्राणी बन्दर होता जा रहा हैं शायर भरत राज़