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मैं  चमकते  दीप की बाती बनूँ तो
फिर तुम्हारे प्यार की पाती बनूँ तो

तुम  जरा  नजरें उठा कर देखो ना
स्वर सजाए  प्यार  के गाती  बनूँ तो

मुख से अपने फिर हटाओ हाथो को
चेहरा तुम्हारा देखकर जाती बनूँ तो

दिल से मेरे नाम अपना ना मिटाओ
भूलकर फिर  प्रीत  दुहराती बनूँ तो

मैं  चमकते  दीप की बाती बनूँ तो
फिर तुम्हारे प्यार की पाती बनूँ तो

भरत राज़

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ख़त्म कर दो अब कहानी ,कुछ बात तो है तेरी मेरी आँखों में पानी , कुछ बात तो है जिस  तरह है  चुप्पियाँ और आँखे नम भी प्यार, धोखा  या  गुमानी , कुछ बात तो है किसान तेरा खेत,नही बिका तो नही बिका बेटी  को  कहता  तू रानी ,  कुछ बात तो है बच्चे  सहमे मुस्काये, बैठे उसके आँचल में बुढिया को कहते हो नानी ,  कुछ बात तो है राव बाज़ी के शहर में 'राज़' राज़ क्या होंगे चलकर आई खुद मस्तानी ,कुछ बात तो है शायर भरत राज़ 
हर   एक   जवां   सिकंदर  सोता जा रहा हैं आँख के आगे इंगित मंजर खोता जा रहा हैं मिल्खियत  के  वास्ते काटे  थे अपनों के गले आज वो छोटा सा टुकड़ा बंजर होता जा रहा हैं खूबसूरत सा हैं , आईना दाग चेहरे के दिखता हाथ  से  जो गिर गया , खंजर होता जा रहा हैं राज़  तूने  कोरे कागज,  कर  दिए हैं चार काले चार आखर आज तेरा मुक्क़दर होता जा रहा हैं यार तेरे कुछ मतले  रखना यूँ संभाल  कर फेसबुकिया हर प्राणी बन्दर होता जा रहा हैं शायर भरत राज़